{content: 60 के दशक में स्व. कार्तिक उरांव और पद्मश्री रामदयाल मुंडा के प्रयासों से सरहुल का जुलूस हर वर्ष निकाला जाने लगा। रामदयाल मुंडा ने 2011 में भास्कर से बातचीत करते हुए कहा था कि 60 के दशक में आदिवासी हॉस्टल में रहने के दौरान एक विचार आया कि आज के आदिवासी युवा अपनी परंपरा और संस्कृति से दूर हो रहे हैं। खासकर शहरों में रहनेवाले लोग अपनी जड़ों से कट गए हैं। इन्हें एक जगह एकत्रित करना जरूरी है। जिस तरह देश के स्वतंत्रता आंदोलन में जान फूंकने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में पारिवारिक रूप से मनने वाले गणेश चतुर्थी पर्व को सार्वजनिक रूप देकर राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ दिया, उसी प्रकार झारखंड में भी ऐसा किया जाना चाहिए। इसी सोच के साथ मैं, कार्तिक उरांव, करमचंद भगत, डॉ. करमा उरांव आदि ने आदिवासियों के बीच जाकर उन्हें सरहुल पर एक खास दिन चैत्र शुल पक्ष तृतीया को एक जगह एकत्र होकर इसे मनाने को कहा। सरहुल झारखंड में विभिन्न दिनों और महीनों में क्षेत्र अनुसार मनाया जाता है। एक दिन तय होने के बाद लोग जुटे और जुलूस निकाली गई। हमारी कोशिश रंग लाई और करीब 100 लोगों के साथ हातमा बस्ती में इसे सार्वजनिक रूप से मनाने लगे। वहां से जुलूस शुरू होकर सिरमटोली तक आने लगा। पहले 100 लोगों से शुरू हुए इस उत्सव में आज लाखों लोग भाग ले रहे हैं। रांची शहर ही नहीं, इसके आस-पास के सैकड़ों गावों से लोग इस जुलूस में शामिल होते हैं। इसके साथ ही लोग अपने-अपने इलाकों में भी धूमधाम से शोभायात्रा निकालने लगे। सिर्फ आदिवासी ही नहीं गैर आदिवासी भी उल्लास से इस जुलूस में शामिल हो 'झारखंड एक है', 'नाची से बांची' का नारा लगा रहे हैं।
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