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7 Nisan 2019 Pazar

60 के दशक में बंद हो गई थी सरहुल शोभायात्रा, 1982 में डॉ. रामदयाल मुंडा की पहल पर दोबारा हुई शुरुआत

{content: सरहुल सदियों से गांव-अखरा में पारंपरिक रूप से मनाया जाता रहा है, लेकिन रांची में 60 के दशक में पहली बार सरहुल जुलूस निकला, जो कुछ वर्षों के बाद बंद हो गया, फिर रांची यूनिवर्सिटी में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग खुलने के बाद पद्मश्री रामदयाल मुंडा के नेतृत्व में जुलूस निकला, जो लगातार निकल रहा है। पहले इस जुलूस में 400 लोग शामिल होते थे, वहीं आज सिर्फ रांची के मेन रोड में डेढ़ लाख से अधिक और पूरे शहर में 4 लाख से अधिक लोग पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य-गीत करते, खुशियां मनाते हुए इस जुलूस में शामिल होते हैं।

दोनों तस्वीरें मेन रोड रांची की

2018

1984



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