{content: 80 के दशक में बिहार की अनदेखी से पूरा झारखंड अशांत था। अलग राज्य की मांग जोरशोर से उठने लगी। 1981 में डॉ. रामदयाल मुंडा रांची यूनिवर्सिटी में देश का पहला जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के अध्यक्ष बनकर जुड़े। जनजातीय विभाग के बीरेंद्र महतो ने बताया कि 60 के दशक से शुरू हुआ सरहुल जुलूस निकलना लगभग बंद हो गया था। सरना नवयुवक संघ ने सरहुल पूर्व संध्या मनाना शुरू किया। इससे फायदा यह हुआ कि शहर में जो यंग जेनरेशन थे, उनके बीच गाने की प्रवृत्ति, नाचने की प्रवृत्ति बढ़ी। लोग कल्चर समझने लगे। 1982 से मुंडाजी के प्रयास से जुलूस निकलना शुरू हुआ, जिसमें झारखंड के तमाम शिक्षाविद्, विद्वान, आंदोलनकारी आने लगे। झारखंड आंदोलनकारियों को जुटने का एक मंच मिला। फिर झारखंड आंदोलन जोर-शोर से शुरू हुआ और 2000 में झारखंड बना।
जनजातीय विभाग के वर्तमान अध्यक्ष त्रिवेणीनाथ साहू जो इस विभाग के पहले बैच के स्टूडेंट्स थे ने कहा कि रामदयाल मुंडा जी के आने के बाद, बीपी केशरी जैसे लोग इस विभाग से जुड़े। यह एक भाषाई, सांस्कृतिक केंद्र बन गया। पूरे झारखंड के विद्वान इस विभाग से जुड़े। फिर सभी ने अपनी कहानियों, कविताओं से झारखंडवासियों को जागरूक करना शुरू किया। एक तरह से नवजागरण शुरू हुआ। इसका केंद्र जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग बना। यहां की बातें, यहां का दर्द बाहर जाने लगा। लोग झारखंड आंदोलन से जुड़ने लगे। पहले इस आंदोलन में सिर्फ आदिवासी जुड़े थे, विभाग बनने के बाद मूलवासी भी जुड़े और झारखंड आंदोलन को बल मिला। झारखंड का सपना सच होने लगा। गांव-गांव में रात में गीत-संगीत होता, जिसमें झारखंड में हो रहे शोषण से लोगों को अवगत कराया जाने लगा।
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