{content: सरहुल पूर्व संध्या पर हर साल रांची विवि के दीक्षांत मंडप में 'सरना फूल' पत्रिका का लोकार्पण होता है। यह पत्रिका सरना नवयुवक संघ द्वारा हर साल दो बार प्रकाशित की जाती है- सरहुल के समय वसंत मंे और करमा के समय बारिश में। इस बार सरना फूल पत्रिका का 38वां अंक आया है। 1987 से नियमित रूप से यह पत्रिका छप रही है। इसके एडिटर हरि उरांव हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार महादेव टोप्पो कहते हैं कि मैं मानता हूं कि मेरा सबसे महत्वपूर्ण लेख सरना फूल पत्रिका में 1989 में छपी थी, जिसका शीर्षक था 'कुचले जाते आत्मसम्मान के विरुद्ध'। इस लेख के छपने के बाद मुझमें एक आत्मविश्वास आया, लिखने का जोश पैदा हुआ। यह लेख मेरा सबसे मार्गदर्शी लेख है। इन्हीं की तरह हजारों आदिवासी युवाओं को यह पत्रिका मार्ग दिखा रहा है।
इस पत्रिका में आदिवासी भाषा, संस्कृति, पर्व-त्योहार, इतिहास, जल, जंगल जमीन, परंपराओं से संबधित लेख, प्रार्थना, कविता आदि छपते हैं। इसके छपने से यह हुआ कि मुट्ठी भर ही लोग, लेकिन उनमें अपनी भाषा-संस्कृति को लेकर जागरूकता आई, लिखने की प्रवृत्ति बढ़ी। नए तरह का विजन पैदा हुआ। हरि उरांव कहते हैं कि इस पत्रिका से महेश भगत, वीरेंद्र उरांव, साधु उरांव, डॉ. करमा उरांव जैसे विद्वान शुरू से जुड़े हुए हैं। मुख्य रूप से यह पत्रिका हिंदी में है, लेकिन इसमें पांच जनजातीय भाषाओं संथाली, मुंडारी, हो, खड़िया और कुड़ुख में प्रार्थना छपती हैं। भाषा-संस्कृति की चीजों के साथ पर्यावरण, विकास, समाज में सुधार, मुख्यधारा में आदिवासी कहां हैं, इस पर भी सामग्री होती हैं।
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