रांची. क्षेत्रीय लोक गीत एवं नृत्य के साथ सरहुल पूर्व संध्या कार्यक्रम का आयोजन रविवार को हुआ। रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में आयोजित इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में रांची के 34 स्कूल, कॉलेज एवं छात्रावासों के छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। एक से बढ़कर एक गीत एवं नृत्य संगीत प्रस्तुत कर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सरना नवयुवक संघ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में संगीत का ऐसा दौर चला कि कार्यक्रम में उपस्थित नेता, कुलपति, प्रतिकुलपति, शिक्षाविद एवं छात्र-छात्राएं सभी झुमने को मजबूर हो गए।
कार्यक्रम में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, गीताश्री उरांव, कुलपति डा रमेश कुमार पांडेय, प्रतिकुलपति कामिनी कुमार, टीआरएल के हेड डाॅ. त्रिवेणी नाथ साहू, रांची विश्वविद्यालय के डीन डा. करमा उरांव, संघ के अध्यक्ष प्रो हरि उरांव सचिव महेश भगत, बिदेंश्वर बेक सहित कई ने हिस्सा लिया। मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड का भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश अन्य राज्यों की तुलना में बिल्कुल भिन्न है। मगर रांची सहित अन्य शहरों का महानगरीय विकास ने गांव-टोले एवं आदिवासयित को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। केवल रांची की बात करें तो चडरी, हातमा, मोरहबादी, हेहल, हेसल, बाजरा, इटकी, हरमू, अरगोड़ा, पुन्दाग सहित कई ऐसे टोले-मुहल्ले जो कभी आदिवासी रीझ-रंग में डुबा रहता था, आज यह सब गायब होता जा रहा है। हम आज अपने पुरखे के दिए हुए संस्कृति को बचा रख पाने में अक्षम साबित हो रहे हैं। सरहुल और करमा जैसे पर्व मनाने में इन बातों का भी संकल्प लेना होगा।
रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. रमेश कुमार पांडेय ने सरहुल की महत्ता पर विस्तार से बताया। उन्होंने कहा सखुआ का पत्ता जीवन से मरन तक इस्तेमाल होता है और सरहुल में इस वृक्ष की पूजा होती है। सरहुल की महत्ता केवल झारखंड भर नहीं रहा और पूरे विश्व पटल पर इस पर्व को मनाया जाने लगा है। यह हमलोगों के निश्चिंतता का विषय है कि आदिवासी समाज प्रकृति की पूजा करता है।
रांची विश्वविद्यालय के डीन डा करमा उरांव ने कहा कि आज भी आदिवासी धर्म कोड की मांग धरा का धरा है। कुछ लोग अब सरना धर्म कोड को लेकर चुनावी बयान दे रहे हैं। मगर ये वही लोग हैं जो सरना को सनातन का हिस्सा मानते हैं। ऐसे लोगों से अपील करते हैं कि सरना धर्म को सनातन की छाया मत बनाएं। सनातन एक अपने आप में बड़ा धर्म है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मगर सरना धर्म भी किसी से कम नहीं है। पूरे देश में 12 करोड़ से अधिक लोग प्रकृति पूजक हैं।
पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव ने कहा कि प्रकृति के विनाश की शर्त पर विकास आदिवासी समाज को मंजूर नहीं है। प्रकृति से खिलवाड़ का विभिषा लोग बाढ़, सूखाड़, जल संकट के तौर पर देख रहे हैं। अगर अब भी पूरी दुनिया के लोग आदिवासी को समझ नहीं पाए तो आदिवासियत तो समाप्त होगी ही साथ ही साथ यह प्रकृति भी नष्ट हो जाएगी। इसलिए सरहुल पर सभी को आदिवासी और आदिवासियत को बचाने का संकल्प लेना चाहिए।
भागीरथी आदिवासी बालिका कॉलेज छात्रावास, अनुसूचित जाति बालिका कॉलेज छात्रावास, आदिवासी बालिका छात्रावास, जनजातीय भाषा एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, पूजा भगीरथी आदिवासी बालिका कॉलेज छात्रावास, कार्तिक उरांव आदिवासी कॉलेज छात्रावास, इंद्रजीत टोप्पो, हो नृत्य एमएस पहाड़ बांगा, श्याम प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, पुनम कुमारी उरांव सरना बालिका छात्रावास, वीर बुधू भगत आदिवासी कॉलेज छात्रावास, पुष्पा कुमारी दीपशिखा आदिवासी पीजी हॉस्टल, राजा बिड़ला छात्रावास, अंजना कुमारी, लक्ष्मण उरांव स्वर्णरेखा आदिवासी पीजी छात्रावास, सरस्वती हरिजन बालिका कॉलेज छात्रावास, अंगनी कुमारी, आदिवासी छात्रावास, जोगो पहाड़ सरना समिति, आदिम जाति सेवा मंडल अाश्रम, राजकीय टाना भगत आवासीय उच्च विद्यालय, कृष्णवाली मुंडा, संथाली छात्र यूनियन, जनजातीय शोध संस्थान छात्रावास, सत्यानारायण मुंडा आदि की टीमों ने हिस्सा सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में सरना नवयुवक संघ द्वारा सरना फूल पत्रिका के 38 वें अंक का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों ने इसका लोकापर्ण किया।
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