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आजकल रंगमंच पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। लोगों के द्वारा नाटक के महत्व को नहीं समझा जाता है। सच तो यह है कि नाटक की गहराई को अच्छी तरह से समझने की जरूरत है। नाटक की गहराई को समझने पर ही नाटक की प्रस्तुति बेहतर होगी। आैर ऐसा होने पर ज्यादा से ज्यादा लोग नाटक से जुड़ सकेंगे।
रांची | शहर के जाने-माने कई रंगकर्मी शुक्रवार को दैनिक भास्कर रांची के कार्यालय में जुटे। पुरानी यादों को ताजा कर रांची में थिएटर के स्वर्णिम काल के बारे में चर्चा की। कहा- तब थिएटर करने के लिए जगहों की कमी तो थी, लेकिन रंगकर्मियों के जोश और जुनून में कोई कमी नहीं थी। दर्शक भी थिएटर के कलाकारों का पूरा साथ दे कर उनका मनोबल बढ़ाते थे। सभी ने आज के समय में रंगमंच की स्थिति पर भी बातें कीं, ताकि फिर से थिएटर के क्रेज को कढ़ाया जा सके। दर्शकों को लुभाया जा सके। एक मंच की जहां कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें।
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गहराई समझने की जरूरत है : शशिकला पौराणिक
अच्छी प्रस्तुति से बढ़ेगा रूझान : अनिल सिकदार
पहले का समय थिएटर का एक बहुत अच्छा समय था। मनोरंजन के साधन बढ़ने के कारण थिएटर का रुझान कम हुआ है। लेकिन मनोरंजन के उन साधनों से भी लोग उब रहे हैं। हमें पूरी तैयारी के साथ एक अच्छी प्रस्तुति देनी होगी। जिससे फिर से लोग रंगमंच के प्रति आकर्षित हों और जुड़ सकें। सरकार की ओर से एक मंच मुहैया कराने की जरूरत है।
रंगमंच के लिए लगाव होना जरूरी : अनिकेत भारद्वाज
रंगमंच के लिए एक तप और एक लगाव का होना जरुरी है। साथ ही इसे सीखने का मद्दा होना चाहिए। मैने 8 वर्ष की उम्र में पहली बार नाटक किया था। नाटक के लिए वह लगाव और वही भूख आज भी है। रंगमंच के लिए अनुशासित होने के साथ-साथ प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। निर्देशक की बातों को मानना होता है।
एक प्रतियोगिता कराने की है जरूरत : नरेश प्रसाद
सरकार को रंगमंच को लेकर एक प्रतियोगिता कराने की जरूरत है। जिससे नाटक को लेकर लोगों में कंपीटिशन की भावना आएगी और रंगमंच को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही शहर में होने वाले नाटकों की सही ढंग से समीक्षा होनी चाहिए। जिससे रंगकर्मियों को अपने नाटक के विषय में सही प्रकार से जानकारी मिल सके।
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80 के दशक में था थिएटर क्रेज : डॉ. अनिल ठाकुर
नए लोगों को लेकर नाटक करता हूं। जिन्हें जोश के साथ कड़ी मेहनत करते देखा है। हमारे आसपास कलाकार बहुत हैं, बस रंगशाला नहीं। 80 के दशक में थिएटर का गजब क्रेज था। शहर में 25 से ज्यादा टीमें थीं। जिनके अंदर नाटक को लेकर भूख देखा जा सकता था। जो नाटक की तैयारी में जूता से लेकर कपड़े सिलने तक का काम करते थे।
हम सभी रंगकर्मी के साथ रंगधर्मी भी हैं : कीर्ति वर्मा
हम सभी रंगकर्मी के साथ-साथ रंग धर्मी भी हैं। हम सभी को मिल कर इस क्षेत्र में काम करने की जरूरत है। जिससे फिर से रंगमंच का एक बेहतरीन समय लाया जा सके। इसके लिए साथ मिल कर सही प्लानिंग के साथ ईमानदार जज्बे और उत्साह की जरूरत पड़ेगी। हम सब को इसके लिए आगे आना होगा।
रिहर्सल के लिए जगह की है जरूरत : ओम प्रकाश
शहर में थिएटर आर्टिस्टों के लिए रिहर्सल करने की जगह की कमी है। आर्टिस्ट कभी ओवरब्रिज तो कभी ऑड्रे हाउस के बरांदा में रिहर्सल करते हैं। इनके लिए एक जगह होनी होना चाहिए जहां बेहतर तरीके से रिहर्सल की जा सके। जिससे रंगमंच को बढ़ावा मिल सके। ज्यादा से ज्यादा रंगकर्मी अपने कला को निखार सकें।
हमें प्रोफेशनल बनने की जरूरत है : दीपक प्रसाद
पहले के जमाने में भी सरकार की ओर से कोई अनुदान नहीं मिलता था। राजा महाराजा के जमाने से नाटक हो रहा है। उसमें भी उन्हें कोई सहयोग नहीं किया जाता था। आज के समय में रंगमंच को बढ़ावा देने के लिए हमें प्रोफेशनल बनना होगा। दर्शक वर्ग बनाने और उसे बढ़ाने के लिए प्रोफेशनल बनना जरूरी है। स्कूल, कॉलेज में रंगमंच सिखाने व्यवस्था हो।
नाटक लेखक, डायरेक्टर की कमी : सुकुमार मुखर्जी
80 से 90 के दशक में नाटक के प्रति लोगों का बहुत रुझान था। बहुत सारे थिएटर ग्रुप्स होते थे। जिनके द्वारा एक से बढ़कर एक नाटक का मंचन किया जाता था। आज के समय में भी कलाकार भरे हुए हैं। कमी है तो बस नाटक लेखकों की और डायरेक्टरों की। जो एक बेहतरीन नाटक की प्रस्तुति करने के लिए आगे आ सकें।
थिएटर क्रेज को बढ़ाने की जरूरत : विनोद जायसवाल
हम सभी को थिएटर के क्रेज को फिर से लाने के लिए आगे आना पड़ेगा। सरकार पर निर्भर रहने से अच्छा है, खुद से कुछ करें। जिससे कलाकारों और रंगमंच काे बढ़ावा मिल सके। इसके लिए हमे प्रोफेशनल रुख अपनाने की जरूरत है। आज के जमाने के लोग भी इसे पसंद करें इसके लिए कुछ बदलाव की भी जरूरत है।
सरकार से इस क्षेत्र में मदद मिले : संजय कुमार लाल
रंगमंच के क्षेत्र में तन-मन से नए लोग जुड़ते हैं, लेकिन ज्यादा समय तक नहीं रह पाते हैं। सरकार की ओर से इस क्षेत्र में मदद मिलना चाहिए। झारखंड बने हुए 18 साल हो गए कला संस्कृति विभाग रंगमंच और रंगकर्मियों के लिए कुछ नहीं कर रही है। कभी बात करने जाते हैं तो कहते हैं पॉलिसी बन रही है। अपनी पॉकेट से प्ले करना संभव नहीं।
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