{content: वर्ष 1962 में छत्तीस वर्ष की आयु में मर्लिन मुनरो की मृत्यु हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ज्ञात हुआ कि नींद की गोलियां अधिक मात्रा में लेने के कारण उनकी मृत्यु हुई। यह विवाद का विषय रहा कि क्या मर्लिन मुनरो ने आत्महत्या की थी या पहली गोली खाने के बाद उन्होंने दूसरी गोली खाई। निद्रा रूठी रही तो नीमबेहोशी में वे गोलियां लेती रहीं। इसी तरह की बात गुरुदत्त की मृत्यु के बारे में भी कही गई। आज इतने दशकों के बाद मर्लिन मुनरो पर चर्चा इसलिए की जा रही है कि अमेरिका में लास्ट डेज ऑफ मर्लिन मुनरो नामक एक सीरियल बनाया जा रहा है।
इस सीरियल की पटकथा लिखने वालों ने मर्लिन मुनरो के जीवन पर शोध किया है। ज्ञातव्य है कि जॉन एफ केनेडी और उनके भाई रॉबर्ट केनेडी भी मर्लिन मुनरो के मित्र रहे और उनके चुनाव प्रचार में मर्लिन मुनरो ने भाग लिया है। सनसनीखेज मीडिया की अजगरी भूख मिटाने के लिए मनगढ़ंत बातें भी की जाती हैं। उन दिनों अफवाह थी कि केनेडी बंधुओं के इशारे पर ही मर्लिन मुनरो को मारा गया और मौत को खुदकुशी का स्वरूप दिया गया। सत्ता का नशा और सितारा नशा दोनों में समानता है। सत्ता का नशा पूरी मानवता को हानि पहुंचा सकता है। सितारा नशा मोमबत्ती की तरह है, जो उजाला देते-देते नष्ट हो जाती है। सहर तक कोई शमा जलती नहीं। कहते हैं कि संगीतकार एआर रहमान संगीत सृजन करते समय कक्ष में एक बड़ी मोमबत्ती रखते हैं और जैसे ही वह बुझ जाती है या चुक जाती है वे सृजन बंद कर देते हैं। चाहे समय कुछ भी हो। कभी-कभी तो बदमाश हवाएं पहले पहर ही शमा बुझा देती हैं, तो रहमान साहब काम बंद कर देते हैं। कभी-कभी शमा ज़िद पर आ जाती है और अलसभोर तक जलती रहती है तो भैरवी प्रेरित धुन बन जाती है। मर्लिन मुनरो भी एक शाम की तरह थी, जिसके परवाने हजारों थे। वह आधी रात तक ही रोशन रही। भला छत्तीस भी कोई उम्र होती है मरने की?
मर्लिन मुनरो अविवाहित प्रेमियों की संतान थी। इस तरह जन्मे व्यक्तियों को 'नाजायज' कहा जाता है। महेश भट्ट ने 'नाजायज संतान' पर कुछ फिल्में बनाई हैं और संदेश दिया है कि संतान नहीं, माता-पिता नाजायज कहे जाने चाहिए। इसी तरह की फिल्म का एक गीत कभी भूला नहीं जा सकता, 'तुम आए तो आया मुझे याद/ गली में आज चांद निकला/ जाने कितने दिनों के बाद गली में आज चांद निकला/... आज की रात जो मैं सो जाती खुलती आंख/ सुबह हो जाती मैं तो हो जाती बस बर्बाद/ गली में आज चांद निकला..।
यह भी बताया गया कि मर्लिन मुनरो की दादी को पागलखाने भेजा गया था। नानी के बारे में भी यही कहा गया। गोयाकि 'पागलपन' मर्लिन मुनरो की जीन्स में ही मौजूद था। मर्लिन मुनरो ने एक एक्स्ट्रा के बतौर कॅरिअर प्रारंभ किया था। बड़े संघर्ष के बाद उन्हें छोटी भूमिकाएं मिलने लगीं। इस तरह पायदान-दर-पायदान चढ़कर वे शिखर सितारा बन पाईं। एक फिल्म में मर्लिन मुनरो अभिनीत पात्र सड़क पर खड़ा है और पागल हवा के झोंके से उसका स्कर्ट ऊपर उठ जाता है। दर्शक इस दृश्य पर तालियां बजाते थे। मर्लिन मुनरो को बाद में ज्ञात हुआ कि फिल्मकार ने उस स्थान पर एक पंखा छिपा रखा था। बहरहाल, मर्लिन मुनरो की सितारा हैसियत की आधारशिला उसका मादक शरीर था। उसे सेक्स सिंबल की तरह प्रचारित किया गया। इस विषय पर विद्या बालन अभिनीत फिल्म 'डर्टी पिक्चर' भी सराही गई थी। दरअसल, सदियों से महिलाओं को अपने बदन की सरहद के परे जाने नहीं दिया गया है। पाकिस्तान की एक शायरा की नज्म है, 'औरत का बदन ही उसका वतन नहीं होता, वह कुछ और भी है, मर्दानगी का परचम लिए फिराने वालों, औरत का बदन जमीं नहीं कुछ और भी है'। यह नज़्म लिखने वाली सारा शगुफ्ता को कुछ समय के लिए पागलखाने भी भेजा गया। पुरुष समाज सारा शगुफ्ता से इतना भयभीत था कि उसका कत्ल कर दिया गया और प्रकरण को कार दुर्घटना बताया गया। इस तरह की दुर्घटनाएं बहुत रची गई हैं। जाने क्यों पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं से भयभीत ही रहा है। इसके एक कारण का संकेत फिल्म 'फायर' में दिया गया है। दीपा मेहता की इस फिल्म में शबाना आजमी और नंदिता दास ने अभिनय किया था।
बहरहाल, अब मर्लिन मुनरो के जीवन और मृत्यु से प्रेरित एक सीरियल अमेरिका में बनाया जा रहा है। हम आशा कर सकते हैं कि इस प्रयास में मर्लिन मुनरो से जुड़े कुछ प्रसंगों का खुलासा भी हो जाएगा। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नींद की गोलियों के साथ 'जहर' की बात भी सामने आई थी, जिसे बाद में बदल दिया गया और 'जहर' के अंश अदृश्य हो गए। महिलाओं का जीवन घूंट दर घूंट, बूंद दर बूंद अंधविश्वास और कुरीतियों का 'जहर' पीना ही रहा है। हम कैसे भूल सकते हैं कि मीरा को भी विषपान करना पड़ा था। दरअसल, यह 'जहर' पुरुष के अवचेतन की एक कंदरा में हमेशा मौजूद रहा है। पुरुष सेक्स फंतासी ने बड़े जुल्म ढाये हैं। सिमान द ब्वॉ का विचार था कि पुरुष अपनी कमतरी को छिपाने के लिए यह करता रहा है। उनका संकेत यौन कमतरी की ओर था।
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